ऋग्वेदः मण्डलं ४. Rigveda, Mandala - 4, Sukta - 11 to 15.

ऋग्वेदः वैदिकस्वरविरहितः मण्डलं ४. Rigveda, Mandala - 4, Sukta - 11.

        भद्रं ते अग्ने सहसिन्ननीकमुपाक आ रोचते सूर्यस्य।
        रुशद्दृशे ददृशे नक्तया चिदरूक्षितं दृश आ रूपे अन्नम्॥ ४.०११.०१

        वि षाह्यग्ने गृणते मनीषां खं वेपसा तुविजात स्तवानः।
        विश्वेभिर्यद्वावनः शुक्र देवैस्तन्नो रास्व सुमहो भूरि मन्म॥ ४.०११.०२

        त्वदग्ने काव्या त्वन्मनीषास्त्वदुक्था जायन्ते राध्यानि।
        त्वदेति द्रविणं वीरपेशा इत्थाधिये दाशुषे मर्त्याय॥ ४.०११.०३

        त्वद्वाजी वाजम्भरो विहाया अभिष्टिकृज्जायते सत्यशुष्मः।
        त्वद्रयिर्देवजूतो मयोभुस्त्वदाशुर्जूजुवाँ अग्ने अर्वा॥ ४.०११.०४

        त्वामग्ने प्रथमं देवयन्तो देवं मर्ता अमृत मन्द्रजिह्वम्।
        द्वेषोयुतमा विवासन्ति धीभिर्दमूनसं गृहपतिममूरम्॥ ४.०११.०५

        आरे अस्मदमतिमारे अंह आरे विश्वां दुर्मतिं यन्निपासि।
        दोषा शिवः सहसः सूनो अग्ने यं देव आ चित्सचसे स्वस्ति॥ ४.०११.०६


ऋग्वेदः वैदिकस्वरविरहितः मण्डलं ४. Rigveda, Mandala - 4, Sukta - 12.

        यस्त्वामग्न इनधते यतस्रुक्त्रिस्ते अन्नं कृणवत्सस्मिन्नहन्।
        स सु द्युम्नैरभ्यस्तु प्रसक्षत्तव क्रत्वा जातवेदश्चिकित्वान्॥ ४.०१२.०१

        इध्मं यस्ते जभरच्छश्रमाणो महो अग्ने अनीकमा सपर्यन्।
        स इधानः प्रति दोषामुषासं पुष्यन्रयिं सचते घ्नन्नमित्रान्॥ ४.०१२.०२

        अग्निरीशे बृहतः क्षत्रियस्याग्निर्वाजस्य परमस्य रायः।
        दधाति रत्नं विधते यविष्ठो व्यानुषङ्मर्त्याय स्वधावान्॥ ४.०१२.०३

        यच्चिद्धि ते पुरुषत्रा यविष्ठाचित्तिभिश्चकृमा कच्चिदागः।
        कृधी ष्वस्माँ अदितेरनागान्व्येनांसि शिश्रथो विष्वगग्ने॥ ४.०१२.०४

        महश्चिदग्न एनसो अभीक ऊर्वाद्देवानामुत मर्त्यानाम्।
        मा ते सखायः सदमिद्रिषाम यच्छा तोकाय तनयाय शं योः॥ ४.०१२.०५

        यथा ह त्यद्वसवो गौर्यं चित्पदि षिताममुञ्चता यजत्राः।
        एवो ष्वस्मन्मुञ्चता व्यंहः प्र तार्यग्ने प्रतरं न आयुः॥ ४.०१२.०६


ऋग्वेदः वैदिकस्वरविरहितः मण्डलं ४. Rigveda, Mandala - 4, Sukta - 13.

        प्रत्यग्निरुषसामग्रमख्यद्विभातीनां सुमना रत्नधेयम्।
        यातमश्विना सुकृतो दुरोणमुत्सूर्यो ज्योतिषा देव एति॥ ४.०१३.०१

        ऊर्ध्वं भानुं सविता देवो अश्रेद्द्रप्सं दविध्वद्गविषो न सत्वा।
        अनु व्रतं वरुणो यन्ति मित्रो यत्सूर्यं दिव्यारोहयन्ति॥ ४.०१३.०२

        यं सीमकृण्वन्तमसे विपृचे ध्रुवक्षेमा अनवस्यन्तो अर्थम्।
        तं सूर्यं हरितः सप्त यह्वीः स्पशं विश्वस्य जगतो वहन्ति॥ ४.०१३.०३

        वहिष्ठेभिर्विहरन्यासि तन्तुमवव्ययन्नसितं देव वस्म।
        दविध्वतो रश्मयः सूर्यस्य चर्मेवावाधुस्तमो अप्स्वन्तः॥ ४.०१३.०४

        अनायतो अनिबद्धः कथायं न्यङ्ङुत्तानोऽव पद्यते न।
        कया याति स्वधया को ददर्श दिवः स्कम्भः समृतः पाति नाकम्॥ ४.०१३.०५


ऋग्वेदः वैदिकस्वरविरहितः मण्डलं ४. Rigveda, Mandala - 4, Sukta - 14.

        प्रत्यग्निरुषसो जातवेदा अख्यद्देवो रोचमाना महोभिः।
        आ नासत्योरुगाया रथेनेमं यज्ञमुप नो यातमच्छ॥ ४.०१४.०१

        ऊर्ध्वं केतुं सविता देवो अश्रेज्ज्योतिर्विश्वस्मै भुवनाय कृण्वन्।
        आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं वि सूर्यो रश्मिभिश्चेकितानः॥ ४.०१४.०२

        आवहन्त्यरुणीर्ज्योतिषागान्मही चित्रा रश्मिभिश्चेकिताना।
        प्रबोधयन्ती सुविताय देव्युषा ईयते सुयुजा रथेन॥ ४.०१४.०३

        आ वां वहिष्ठा इह ते वहन्तु रथा अश्वास उषसो व्युष्टौ।
        इमे हि वां मधुपेयाय सोमा अस्मिन्यज्ञे वृषणा मादयेथाम्॥ ४.०१४.०४

        अनायतो अनिबद्धः कथायं न्यङ्ङुत्तानोऽव पद्यते न।
        कया याति स्वधया को ददर्श दिवः स्कम्भः समृतः पाति नाकम्॥ ४.०१४.०५


ऋग्वेदः वैदिकस्वरविरहितः मण्डलं ४. Rigveda, Mandala - 4, Sukta - 15.

        अग्निर्होता नो अध्वरे वाजी सन्परि णीयते।
        देवो देवेषु यज्ञियः॥ ४.०१५.०१

        परि त्रिविष्ट्यध्वरं यात्यग्नी रथीरिव।
        आ देवेषु प्रयो दधत्॥ ४.०१५.०२

        परि वाजपतिः कविरग्निर्हव्यान्यक्रमीत्।
        दधद्रत्नानि दाशुषे॥ ४.०१५.०३

        अयं यः सृञ्जये पुरो दैववाते समिध्यते।
        द्युमाँ अमित्रदम्भनः॥ ४.०१५.०४

        अस्य घा वीर ईवतोऽग्नेरीशीत मर्त्यः।
        तिग्मजम्भस्य मीळ्हुषः॥ ४.०१५.०५

        तमर्वन्तं न सानसिमरुषं न दिवः शिशुम्।
        मर्मृज्यन्ते दिवेदिवे॥ ४.०१५.०६

        बोधद्यन्मा हरिभ्यां कुमारः साहदेव्यः।
        अच्छा न हूत उदरम्॥ ४.०१५.०७

        उत त्या यजता हरी कुमारात्साहदेव्यात्।
        प्रयता सद्य आ ददे॥ ४.०१५.०८

        एष वां देवावश्विना कुमारः साहदेव्यः।
        दीर्घायुरस्तु सोमकः॥ ४.०१५.०९

        तं युवं देवावश्विना कुमारं साहदेव्यम्।
        दीर्घायुषं कृणोतन॥ ४.०१५.१०

ऋग्वेदः वैदिकस्वरविरहितः मण्डलं ४. Rigveda, Mandala - 4, Sukta - 15.

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